दिल्ली में दहाड़ा झाबुआ का लाल, डॉ. विक्रांत भूरिया ने रामलीला मैदान से ललकारी सत्ता

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उमेश चौहान/झाबुआ

झाबुआ से कांग्रेस विधायक, मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष
डॉ. विक्रांत भूरिया दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में उस आंदोलन की आवाज़ बने, जो केवल सत्ता के खिलाफ नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को बचाने के लिए खड़ा हुआ है। लाखों लोगों की मौजूदगी में डॉ. भूरिया का मंच पर आना यह बताने के लिए काफी था कि यह कोई औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा की सधी हुई अभिव्यक्ति थी।

यह रैली नहीं, लोकतंत्र के अपमान के खिलाफ रेला था

आज की यह सभा सामान्य राजनीतिक रैली नहीं थी। यह रेला था जहाँ हर व्यक्ति की आंखों में वोट चोरी के खिलाफ गुस्सा था,
क्योंकि यह चोरी किसी पार्टी की नहीं,
हर नागरिक के संवैधानिक अधिकार “एक व्यक्ति, एक वोट” की चोरी थी। डॉ. विक्रांत भूरिया के शब्दों में यह स्पष्ट संदेश था कि
लोकतंत्र को कमजोर करने की किसी भी साजिश को अब चुपचाप सहन नहीं किया जाएगा।

आदिवासी समाज के अधिकारों को खत्म करने की साजिश

इस आंदोलन की सबसे गंभीर चिंता यह रही कि आदिवासी समाज के अधिकारों को सुनियोजित तरीके से कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। जिस समाज ने देश की आत्मा को संभाला, उसी समाज की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करना
सीधे-सीधे संविधान पर हमला है। डॉ. भूरिया ने मंच से साफ कहा यह लड़ाई सत्ता की नहीं, यह लड़ाई पहचान, अधिकार और सम्मान की है।

दिल्ली में दहाड़ा झाबुआ का लाल

रामलीला मैदान में जब झाबुआ का लाल बोल रहा था, तो सिर्फ आवाज़ नहीं गूंज रही थी एक पूरे आदिवासी समाज का आत्मविश्वास बोल रहा था। मंच मिला, देश के सामने संबोधन मिला और लाखों की भीड़ में सुनी गई बात। यह दृश्य बताता है कि
डॉ. विक्रांत भूरिया की पकड़ अब केवल क्षेत्रीय नहीं, राष्ट्रीय हो चुकी है।

दिल्ली दरबार का संदेश, एमपी की राजनीति में हलचल

दिल्ली से आई यह तस्वीरें मध्यप्रदेश के उन नेताओं को असहज जरूर करेंगी, जो लंबे समय से डॉ. विक्रांत भूरिया को साइड लाइन करने की राजनीति कर रहे थे। दिल्ली के मंच ने साफ कर दिया जिस नेता के साथ जनता खड़ी हो, उसे हाशिए पर रखना आसान नहीं होता।

यह भीड़ नहीं, आने वाले राजनीतिक दौर की झलक

रामलीला मैदान में उमड़ा जनसैलाब
सिर्फ विरोध नहीं था यह आने वाले समय की राजनीतिक दिशा का संकेत था। आज दिल्ली ने सुना, देश ने देखा और मध्यप्रदेश की राजनीति ने संकेत समझ लिया होगा। डॉ. विक्रांत भूरिया अब केवल झाबुआ की आवाज़ नहीं, आदिवासी अधिकारों की राष्ट्रीय आवाज़ बनकर उभरे हैं।