झाबुआ जिले के पिटोल के एक हाई स्कूल से जुड़ा बताया जा रहा एक वीडियो आज दिनभर से सोशल मीडिया पर तूफान बन चुका है। यह वीडियो केवल वायरल क्लिप भर नहीं है, बल्कि उस शिक्षा-तंत्र की असलियत का आईना है, जो बच्चों को सुरक्षा और संस्कार देने का दावा करता है। वीडियो में बच्चों के साथ जिस तरह का व्यवहार दिखाई देता है, उसने न केवल परिजनों बल्कि पूरे समाज को हिला कर रख दिया है। शिक्षा देने वाली एक शिक्षिका जब अभद्र भाषा और धमकियों के सहारे बच्चों को दबाती है और बात-बात पर चप्पल उठाकर मारने लगती है, तो सवाल केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है।
क्लिप में शिक्षिका को छात्रों पर बरसते हुए सुना जा सकता है—“क्या वीडियो बना रहे हो? फेल कर दूंगी मैं… विद्यार्थी के नाम पर धब्बा हो तुम।” इसके जवाब में बच्चे भी चुप नहीं रहते और पलटकर कहते हैं—“हमको क्या, तुमको क्या?” नतीजा यह होता है कि स्कूल का माहौल शिक्षा का मंदिर न रहकर धमकियों और अपमान का अखाड़ा बन जाता है। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील दर्शक को झकझोरने के लिए काफी है।
सूत्रों का कहना है कि यह शिक्षिका लंबे समय से अपने व्यवहार से बच्चों और सहकर्मियों को परेशान कर रही है। परिजनों का आरोप है कि जब वे शिकायत लेकर स्कूल पहुँचे तो उनके सामने ही बच्चों को चप्पल से पीटा गया। यह घटना बताती है कि यह मामला कोई एक दिन का नहीं, बल्कि लगातार जारी दुर्व्यवहार की पराकाष्ठा है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक यह है कि स्कूल प्रशासन इतने आरोपों के बावजूद चुप्पी साधे बैठा रहा। आखिर क्यों? क्या उन्हें बच्चों की सुरक्षा और सम्मान की कोई चिंता नहीं? और क्या शिक्षा विभाग की निगरानी केवल तब सक्रिय होती है जब कोई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है?
पिटोल का यह मामला अब जिले में ही नहीं बल्कि प्रदेश स्तर तक चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यही है वह शिक्षा-तंत्र जिस पर हम अपने बच्चों का भविष्य भरोसे के साथ छोड़ते हैं? यदि आरोप सही हैं, तो केवल शिक्षिका ही नहीं बल्कि पूरे प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। यह केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि बच्चों के सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य का सवाल है।
इस पूरे विवाद ने एक बात साफ कर दी है—पिटोल का यह वायरल वीडियो शिक्षा की उस सच्चाई को सामने लाता है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है। जब पढ़ाई की जगह गाली, धमकी और मारपीट का माहौल हो, तो यह किसी एक शिक्षक की ग़लती नहीं बल्कि पूरे शिक्षा-तंत्र की विफलता है। अब जिम्मेदारों को जवाब देना ही होगा, क्योंकि समाज का धैर्य टूट चुका है और बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता।